ज़ाहिर है ,
ज़ाहिर है ,
मेरा बिखर जाना ,
के तेरा मुड़ कर न देखना।
बेशक ठहराव है ,
और अनंत है ;
क्युँ कि ज़ाहिर है न
मेरा चले आना
और तेरा ना मानना।
फ़क़त तसव्वुर है के तू है
खूबसूरत है , इल्म भी है
मगर मंज़ूर नहीं ,
एक सैलाब सा है , जैसे
उजड़ गया है दिल का ये शहर।
ज़ाहिर है ,
के तू वो नहीं
जो आँखों के सामने है
या बस मान लू एक तसव्वुर ही।
दरख्वास्त है मुक़र्रर
तेरा न मुड़ना ,
और मेरा मुझमे लौट आना।
मगर क्या ज़ाहिर है ?
शहर का उजड़ जाना ,
और शोर तक न होना।
- दिशा


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