फ़क़ीरी
"क्यों सवालो से उलझते हो
उलझते उलझते जीते हो
मस्त मौला गाते हो
खुदको बांधे जाते हो ।
समंदर सा हो बेफिकर
जब खिलना हो खिल जाओ ;
खेलों तुम तूफ़ानो से ,
और गिरना हो तो गिर जाओ ।
बेफ़िक्री में जीना है
सो तो कबीरा जाने रे
दुनिया में सौ नाम कमाओ
फिर ख़ुद मिट्टी बन जाना रे ।।
जीते जीते भी क्या मारना है
सासें तो एक दिन थमनी है ,
क्यों भागे है उसके पीछे
जो ना साथ तेरे चलनीं है ;
फिर भी अगर गुंजाइश है
तो सब तेरा है , जा कमा ले
धन , दौलत , नाम जपते जपते
फिर फ़क़ीर बन जाना रे ।”
- दिशा


Comments
Post a Comment