गहराइयाँ

 



ये ज़िंदगी , ज़िंदगी कहा ? समंदर ही तो है ,

मगर मुझमें ना डूबने की हिम्मत है

 और ना ही पार जाने की ,

धुँधा कई कश्ती और बैठी भी इस मक़सद से

 के पोहछूँगी कभी उस पार ,

मगर  ये हर बार वही किनारे लाकर छोड़ती है ।

अब और सहारा देखती भी हूँ तो ,

ये लहरें जवाब के ख़त दस्तक तक दे जाती है 

कितनी भी कोशिश करूँ , 

बेसहाये को वापिस किनारे ही ले आती है ।

सवाल तो अब ये भी नहीं के “कब तक ?”

मंज़ूर है मुझे बहना भी , 

चाहे डूब कर असीम गहराई में खो जाऊँ 

या फिर पोहचू उस पार और जाकर देखु 

के कोई फ़र्क़ नहीं इस पार और उस पास में ।

क्यों? 

क्यूकि ये समंदर जो दिख रहे है ये बाहर थोड़ी है ,

जो है मेरे अंदर है , 

बसा हुआ , ठहरा हुआ ।

अगर किसी से पार पाना है 

तो ये अंदर की लहरों से पार पाना है ।

कैसे? 

पता नहीं , अब बिना कश्ती के ही पार पाना है ।

समंदर के असीम गहराई में जाकर , 

पूरे समंदर के तूफ़ानो से पार पाना है ,

क्यूकि अगर इन गहराइयो को ही नहीं जाना , समझा 

तो फिर क्या ही फ़र्क़ होगा मेरे इस पार या उस पार होने में ।

असल बात तो डूबने में है , उस पार जाने में नहीं ।

-Disha


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