दिल एक तैखाना

 ये दिल एक तैखाना है 

टूट रही दीवारें इसकी 

ना हैरान हूँ मैं ,

ना ही आखें नाम है ;

और तुम पूछते हो 

के किस बात का ग़म है ।


कोई बताए ये शोर-गुल कैसा है ,

नया मेहमान आया है क्या ? 

पुराने तस्वीरों को कहा छुपाऊँ ?

कैसे बताऊ , किस तसव्वुर में हम है ;

और तुम पूछते हो ,

के किस बात का ग़म है ।


न धूप न साया न शोर कोई 

बड़ी देर हुई किसी को आये , 

दरीचे दरवाज़े दरअसल 

बंद पड़े है सारे ;

यूँ बेजान बैठी हूँ 

के जाना कोई तो हो 

यहाँ हमनफ़स मेरा ;


मगर दिखे ना कोई जिस्म 

न दिखे कोई निशान यहाँ 

वक़्त का कैसा हसीन ज़ख़्म है ?

और तुम पूछते हो ,

के किस बात माँ ग़म है ।

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