हज़ार कविता
मेरी पहचान क्या है ?
ये नाम ,
जिसको ज़माने ने जाना ;
ये काम ,
जिससे पेट तो भरा
मगर भूख नहीं मिटी ।
अब ये नज़्म
जो फ़क़त मेरे थे
ये सोचा था मैंने ,
अब ये भी तेरे हो गये ।
यहाँ इस जहान में
मेरा कुछ भी नहीं
मगर, मैं फिर भी
लिखती रहूँगी ,
मैं तुझपे हज़ार
कविता लिखूँगी
और लिखते रहूँगी ;
जब तक ये नज़्म का
हर एक लफ़्ज़
ज़हन में उतर कर
मेरे आत्मा को ना छू ले ,
और पूरे तरीक़े से
मेरी ना हो जाये ;
मैं लिखते रहूँगी
तुझपे कविता ।
- दिशा

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