बेफ़ीज़ूल की कविता

 बेफ़ीज़ूल में आखों का नम होना मुनासिब नहीं

ख़ामख़ा ही नाराज़ है दुनिया - दुनिया वालों से ;


 क्यों लिखते हो ये ग़ज़ल , ये कहानियाँ ग़म के?

दुनिया की ही शिकायत करते हो - दुनिया वालों से ।




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