तेरा विश्वास
कही दूर से तेरी
आवाज़ सुनाई पड़ती है ;
समंदर से होकर ,
घटाओं वादियों से मिलकर ,
मेरे घर के दरीचों से लड़कर ;
तेरी याद मुझ तक
पहुचतीं है यूँ ।
तेरी फ़ुर्क़त की ताज़गी
फ़ुरसत से पिरोती मैं
एक एक धागा ;
ज़र्रा-ज़र्रा हर्फ़-हर्फ़
तेरी हर बात ,
कलायीं में बंधा
वो मंदिर का धागा है ,
वो दिखे ना दिखे
तू रहे ना रहे ।


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