मुकम्मल ख़त
मुकम्मल पूरा एक ख़त लिखा है
के अब खुला आसमाँ लिखा है ।
तुम कहो तो देखु ज़रा ,
क़दम दस्तक के उस पार रखु;
के ज़िंदगी ने एक अंजाम लिखा है ।
बेफ़ीज़ूल इस जहाँ में क्या है
तनहा ज़मीन तनहा आसमान है ,
ये फूल ले तो लू मग़र
कमबख़्त मुरझाने के लिए
फूलो का क़ीमत लिखा है ।
ये रूह आज़ाद है
फ़क़त क़ैद है ये जहान ,
तरसे ये निगाहें घर को
के अब घर भी बंजारा लिखा है ;
मुकम्मल पूरा एक ख़त लिखा है
के अब खुला आसमाँ लिखा है ।
~ दिशा

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